सांगलिया ग्राम का नाम सांगा बाबा (स्वांग) के नाम से पड़ा।
धूणी माता की स्थापना व यहाँ पर लोगों को चमत्कार दिखाने का कार्य सर्वप्रथम बाबा लक्कड़ दास जी महाराज ने आज से लगभग ३५० वर्षों पूर्व (विक्रम संवत् १७२५) में किया था।
लोक किंवदन्तियों व जनश्रुतियों के अनुसार सर्वप्रथम सांगलिया ग्राम में बाबा लक्कड़ दास जी ने आज से लगभग ३५० वर्षों पूर्व (विक्रम संवत् १७२५) सांगलिया में आकर आसन लगाया था। ऐसा माना जा रहा है कि महाराज का जानम फतेहपुर के सिकलीगर समुदाय में हुआ था।
बाबा लक्कड़ दास जी ने बाल्यकाल से ही घर छोड़ दिया व जगह-जगह साधुओं की संगत करते हुए पंजाब राज्य के बोहर स्थान पर पहुँचे। वहाँ पर कोई साधु महाराज १२ वर्ष तक मौन धारण कर पलक लगाए बैठे थे। लक्कड़ स्वामी ने उनको देखा तो वहीं खड़े हो गए। महाराज समाधिस्थ थे व सामने धूणा जग रहा था। महाराज ने अपनी आँखें खोली तो लक्कड़ स्वामी ने कहा, महाराज मुझे कुछ देवो। महाराज ने उनकी ओर देखा और धूणी में से अग्नि उठाकर बाबाजी को दे दी। बाबाजी अपनी शक्ति के द्वारा अपनी चादर में अग्नि ऐसे बाँध ली जैसे कोई प्रसाद लेता है। वहाँ से चलकर बाबाजी सीधे सांगलिया में आए व धूणी माता की स्थापना की जो ज्योति आज तक लगातार जग रही है।
बाबा लक्कड़ दास जी से लोग डरते थे क्योंकि ये अघोरी थे। कुछ भी खाने-पीने से परहेज नहीं होता था। मगर दु:ख-दर्द वाले को दूर से ही कहकर ठीक कर देते थे।
लक्कड़ दास जी के ७ शिष्य थे जो अलग-अलग स्थानों पर जाकर जन-जन की सेवा करते रहे।
मान दास जी महाराज का जन्म जयपुर से सीकर के बीच रींगस ग्राम के पास मेहरोली में राजपूत परिवार में हुआ। चूंकि उस समय समाज की सभी जातियों में राजपूत समाज ज्यादा सम्पन्न हुआ करता था। मगर आपने राजसी आन-बान की परवाह किये बगैर बचपन में ही ज्ञान प्राप्ति के लिए उन्होंने आपने घर छोड़ दिया। कई स्थानों पर घूमते-घूमते सांगलिया में आए तो राम दास जी महाराज से मुलाकात हो गई व उनके आचार-विचार भावों की प्रधानता को देखते हुए महाराज राम दास जी के परम शिष्य बन गए।
महाराज के समाधिस्थ होने के बाद साधू समाज ने आपको सांगलिया पीठाधीश्वर पद पर आसीन किया व बहुत ही योग साधना व बहृमा विचारों से दीन-दुखियों की सेवा की।
मौजी दास जी महाराज श्री मान दास जी महाराज के शिष्य हे।